Sunday, July 20, 2008

संसद की प्रतिध्वनि

मुझसे कहा गया कि संसद / देश कि धड़कन को / प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है /जनता के विचारो का /नैतिक समर्पण है /लेकिन क्या यह सच है / अपने यहाँ संसद / तेली कि वह घानी है / जिसमे आधा तेल और आधा पानी है ।सत्तर के दशक में लिखी गयी धूमिल की कविता की ये पंक्तियों आज कोई नया बहस तो नही छेड़ती लेकिन एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर देती है की हम जिस जनतंत्र पर अभिमान करते है ,भरोसा करते है ओ वाकई करने लाएक है । २२ जुलाई को संसद में विश्वास मत होगा । सरकार बच जाए या गिर जाए लेकिन कई दिनों से जारी इसको बचाने और गिराने की घटनाओ ने संसद और जनतंत्र की परिभाषा बदल दी है । हलाकि ये पहली बार नही है की संसद और जनतंत्र को ये कहने पर मजबूर होना पड़ा हो की ओ जनता के प्रतिनिधियों मेरे साथ खिलवाड़ मत करो ।मेरे विचारो की बलि मत चढाओ। मुझे मंडी मत बनाओ । मै बिकाऊ नही हूँ । मै बना हूँ देश और जनता के हित के लिय । कई रंग ,रूप ,और परिस्तिथियों को देखते देखते साठ साल का हो गया हूँ । तुम लोग समझ रहा होगा की हमसे बड़ा खिलाड़ी कोई नही है , तो ये तुम्हारी भूल हैं । तुम मौकापरस्त हो । तुम्हे अब खेलने का मौका नही मिलेगा। और इस बार तुम यदि मौकापरस्ती का खेल खेला तो मै साफ साफ कहे देता हूँ तुम्हारा खैर नही । जनता पहल शुरू कर दी है तुम्हारे चेहरे को बेनकाब करने के लिय ।

Sunday, July 13, 2008

दीपावली के दिन का पागल

दीपावली की ओ शाम । दो तीन गठ्ठर लिए ओ खुश था । मानों उसे बहुत बड़ा धन मिल गया हो । बारी बारी से सभी गठ्ठर को खोलता और कुछ खोजने लगता और उसके साथ हीं उसकी खुसी बढती जा रही थी । मै दिल्ली प्रेस क्लब के सामने बस स्टैंड पर बस के इंतजार में खड़ा था और उसे देख रहा था । अब ओ एक गन्दा पुराना पैंट हाथ में लिय बार बार अपने पैरो से नाप रहा था । मुझे ये समझते देर न लगी की जिसे मै देख रहा हूँ ओ भले ही पागल है लेकिन अपनी जरूरतों को पुरा कराने की कोशोश इसे भी है । उसको पुरा होने पर तसल्ली भी है । नही तो क्यो जिसे पागल कह कर हम हमारा समाज पल्ला झाड़ लेता है ओ भी अपना तन ढकने के लिए उतावला है ।सवाल स्वाभाविक हैं कहा से इस समय उसका दिमाग काम करने लगा । मै येही सवाल सोचते सोचते बस में सावर हो गया । दीपावली की शाम थी । मेरे जैसे कई लोंग अपने अपने दफ्तर से घर जा रहे थे । बच्चे पठाका छोड़ने की तैअरी कर रहे थे । मिठाइयों की दुकानों पर भीड़ दिखाई दे रही थी । लेकिन मेरा मन बार बार उसी सवाल पर चला जाता कैसा होगा उन जैसे कई पागलो की दीपावली । क्या उन्हें इस तरह की खुशी मानाने का मन नही करता होगा । जब एक पुराना और गन्दा पैंट मिलने से इतनी प्रशानानता हो सकती है तो साल में एक बार आने वाली ये पर्व कैसे उनको नही कचोटता होगा ।किसकी गलतियों का ये खामियाजा भुगत रहे हैं । समाज की , सरकार की या ख़ुद की । गलती किसी की हो जरुरत है उसे ख़तम करने की नही तो हम सब इसकी गिरफ्त में आ जायेंगे और किशी भी तरह की खुसी का कोई मैंने नही रह जाएगा ।

अरे ये पागल है

वह कभी जोर जोर से हसने लगता था तो कभी रोने । कभी इंग्लिश में बोलने लगता तो कभी साइंस की बात करने लगता । कभी परधानमंत्री से बात करता तो कभी डैरेक्ट भगवन से बाते करने लगता । मेरे जैसे कई लोग उसको देख रहे थे और ये बोलते हुए चले जा रहे थे की अरे ये पागल है । देखते देखते न जाने किते मुसाफिर उसको देख अपनी अपनी मंजिल की ओर चले गए । इसका एहसास मुझे तब हुआ जब ३४४ नम्बर की खाली डीटीसी बस आई और मै भी उस पर सवार होकर अपनी मंजिल की ओर चल दिया । इस घटना के बाद मै दिल्ली के रेड , बस स्टैंड , स्टेशन और रेड लाईट पर पागलो की इस तरह की घटनाओ को उतनी देर तक नही देखा जितना की पहली बार देखा था । लेकिन उस समय से अब तक सोचता कही जयादा हु । इन लोगो ने भी कभी हमारे तरह एक उम्मीद और संघर्ष की जिंदगी जिया होगा । इनका भी अपना परिवार होगा एक सपना होगा । हलाकि ये रिसर्च और मनोचिकित्सा का विषय है की इन के पागल होने का कारन क्या है और कितनो का घर बार है या नही । लेकिन सबसे दुःख दाई बात ये है की इनके अंदर भी एक जीव है । और सिर्फ़ सेंस को काम न करने की स्तिथि में ये नरक की जन्दगी जीने को मजबूर है । अगर मनोचिकित्सक की बात मने तो आज तेजी से बदल रहा जमाना , भागदौड़ की जन्दगी , अतिम्ह्ताव्कंछा और आदमी को आदमी न रहने का कारक जैसी बाते है जिससे पागलपन की स्तिथि पैदा होता जा रहा है । हलाकि और भी कारन हो सकते हैं पागलपन की ।तब मै डर जाता हु की न जाने इसके चपेट में कौन आ जाए । तो जरुरत है इस बदलतेदौर में इन्सान बने रहने की। और यही एक उपाय है पागलो से और पागलपन से निपटने का ।