Sunday, July 13, 2008

अरे ये पागल है

वह कभी जोर जोर से हसने लगता था तो कभी रोने । कभी इंग्लिश में बोलने लगता तो कभी साइंस की बात करने लगता । कभी परधानमंत्री से बात करता तो कभी डैरेक्ट भगवन से बाते करने लगता । मेरे जैसे कई लोग उसको देख रहे थे और ये बोलते हुए चले जा रहे थे की अरे ये पागल है । देखते देखते न जाने किते मुसाफिर उसको देख अपनी अपनी मंजिल की ओर चले गए । इसका एहसास मुझे तब हुआ जब ३४४ नम्बर की खाली डीटीसी बस आई और मै भी उस पर सवार होकर अपनी मंजिल की ओर चल दिया । इस घटना के बाद मै दिल्ली के रेड , बस स्टैंड , स्टेशन और रेड लाईट पर पागलो की इस तरह की घटनाओ को उतनी देर तक नही देखा जितना की पहली बार देखा था । लेकिन उस समय से अब तक सोचता कही जयादा हु । इन लोगो ने भी कभी हमारे तरह एक उम्मीद और संघर्ष की जिंदगी जिया होगा । इनका भी अपना परिवार होगा एक सपना होगा । हलाकि ये रिसर्च और मनोचिकित्सा का विषय है की इन के पागल होने का कारन क्या है और कितनो का घर बार है या नही । लेकिन सबसे दुःख दाई बात ये है की इनके अंदर भी एक जीव है । और सिर्फ़ सेंस को काम न करने की स्तिथि में ये नरक की जन्दगी जीने को मजबूर है । अगर मनोचिकित्सक की बात मने तो आज तेजी से बदल रहा जमाना , भागदौड़ की जन्दगी , अतिम्ह्ताव्कंछा और आदमी को आदमी न रहने का कारक जैसी बाते है जिससे पागलपन की स्तिथि पैदा होता जा रहा है । हलाकि और भी कारन हो सकते हैं पागलपन की ।तब मै डर जाता हु की न जाने इसके चपेट में कौन आ जाए । तो जरुरत है इस बदलतेदौर में इन्सान बने रहने की। और यही एक उपाय है पागलो से और पागलपन से निपटने का ।

2 comments:

Kumar Kaustubha said...

pehal achhi hai....aage badhayeeye...lekin ek sujhav yahi hai ki hindi likhte waqt spelings ka khyal rakhen to hindi ka bhala hoga.

Unknown said...

Abe chutiye ne toh media ka naam hi badnaam kar diya hai...
Teri jagah toh siti cable mein bhi nahi hai...

With Regards...
Ek Samajhdar Chutiya