Sunday, July 13, 2008

दीपावली के दिन का पागल

दीपावली की ओ शाम । दो तीन गठ्ठर लिए ओ खुश था । मानों उसे बहुत बड़ा धन मिल गया हो । बारी बारी से सभी गठ्ठर को खोलता और कुछ खोजने लगता और उसके साथ हीं उसकी खुसी बढती जा रही थी । मै दिल्ली प्रेस क्लब के सामने बस स्टैंड पर बस के इंतजार में खड़ा था और उसे देख रहा था । अब ओ एक गन्दा पुराना पैंट हाथ में लिय बार बार अपने पैरो से नाप रहा था । मुझे ये समझते देर न लगी की जिसे मै देख रहा हूँ ओ भले ही पागल है लेकिन अपनी जरूरतों को पुरा कराने की कोशोश इसे भी है । उसको पुरा होने पर तसल्ली भी है । नही तो क्यो जिसे पागल कह कर हम हमारा समाज पल्ला झाड़ लेता है ओ भी अपना तन ढकने के लिए उतावला है ।सवाल स्वाभाविक हैं कहा से इस समय उसका दिमाग काम करने लगा । मै येही सवाल सोचते सोचते बस में सावर हो गया । दीपावली की शाम थी । मेरे जैसे कई लोंग अपने अपने दफ्तर से घर जा रहे थे । बच्चे पठाका छोड़ने की तैअरी कर रहे थे । मिठाइयों की दुकानों पर भीड़ दिखाई दे रही थी । लेकिन मेरा मन बार बार उसी सवाल पर चला जाता कैसा होगा उन जैसे कई पागलो की दीपावली । क्या उन्हें इस तरह की खुशी मानाने का मन नही करता होगा । जब एक पुराना और गन्दा पैंट मिलने से इतनी प्रशानानता हो सकती है तो साल में एक बार आने वाली ये पर्व कैसे उनको नही कचोटता होगा ।किसकी गलतियों का ये खामियाजा भुगत रहे हैं । समाज की , सरकार की या ख़ुद की । गलती किसी की हो जरुरत है उसे ख़तम करने की नही तो हम सब इसकी गिरफ्त में आ जायेंगे और किशी भी तरह की खुसी का कोई मैंने नही रह जाएगा ।

1 comment:

Kumar Kaustubha said...

badhiya hai...kuchh interesting item ke liye kissago.blogspot.com padhiye......